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अध्ययन-कक्ष - डॉसतीशराज पुष्करणा





जयशंकर प्रसाद की आदर्शवादी लघुकथाएं : डॉ0 सतीशराज पुष्करणा

 
हिन्दी-कथा-साहित्य के आरंभिक काल में जिन कथाकरों ने अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह किया, उनमें निस्संदेह जयशंकर प्रसादअग्रगण्य हैं। प्रसाद मूलतः कवि थे ; किन्तु वह जितने महान कवि थे, उतने ही महान् नाटककार एवं कथाकार भी थे। इस तथ्य को रामचन्द्र शुक्ल ने भी स्वीकार किया है कि उनका समुचा कथा-साहित्य आदर्शवादी दृष्टिकोण की व्यापकता पर ही आधारित है। परन्तु अपनी इस आदर्शवादी भावना के कारण उनकी कथाओं में प्रायः ऐसी दिशाएँ प्रत्यक्ष होती हैं, जो उन्हें एक आदर्श कथाकार के रूप में स्थापित कर देती हैं ।

प्रसाद के तीन उपन्यास-‘कंकाल’, ‘तितली’और ‘इरावती’प्रकाशित हुए तथा ‘छाया’, ‘आकाशदीप’, ‘आँधी’और ‘इन्द्रजाल’ - चार कहानी-संग्रह प्रकाश में आए । इनके अतिरिक्त एक कथा-संग्रह ‘प्रतिध्वनि’सन् 1926 में प्रकाशित हुआ था। इस कथा-संग्रह में उनकी कुल पन्द्रह कथाएँ संगृहीत हैं। इन पन्द्रह कथाओं में नौ तो आज की लघुकथाओं जैसी हैं तथा अन्य छह कथाएँ स्पष्ट रूप से लघुकथा की परिसीमा का अतिक्रमण करती प्रतीत होती हैं ।उनकी लघुकथा जैसी नौ कथाएँ क्रमशः इस प्रकार हैं - ‘गुदड़ी के लाल’, ‘पत्थर की लिपि’, ‘खंडहर की लिपि’, ‘गूदड़ साईं’, ‘कलावती की शिक्षा’, ‘प्रसाद’, ‘करुणा की विजय’, ‘उस पार का योगी’और ‘चक्रवर्ती का स्तम्भ’।

जयशंकर ‘प्रसाद’ने 1906 ई. में ‘सावन पंचक’नामक कविता से लेखनारंभ किया । उनकी यह कविता ‘भारतेन्दु’में प्रकाशित हुई थी। इसी वर्ष उन्होंने ‘उर्वशी चंपू’एवं ‘प्रेमराज्य’का प्रणयन किया, जिनका प्रकाशन सन् 1910 में हुआ। 1910 ईका वर्ष उनके साहित्यिक जीवन के लिए अत्यधिक उपलब्धिपूर्ण सिद्ध हुआ। इसी वर्ष से वह ‘इन्दु’पत्रिका में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे। वह कविता के अतिरिक्त कहानियाँ, नाटक और निबंध् भी पूरी प्रतिभा के साथ लिखने लगे थे। उनकी प्रथम कहानी ‘ग्राम’ही इसी वर्ष प्रकाश में आई । हिन्दी-कहानी की आरंभिक कहानियों में ‘ग्राम’की चर्चा होती है । इस कहानी से ही हिन्दी-कथा-साहित्य में एक नये युग का सूत्रपात होता है। यह वह समय था जब विश्व की अन्य उल्लेखनीय भाषाओं में खलील जिब्रान, मोपांसा, रोमां-रोलां इत्यादि कथाकारों की कथाओं की धूम मची हुई थी । भारतेन्दु का कथा-साहित्य भी हिन्दी-कथा-जगत् में अपनी जड़ें जमा चुका था। ऐसे में जयशंकर ‘प्रसाद’ने कथा-साहित्य में एक नई राह तलाश की । ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’का ध्यान तो उन्होंने रखा ही-इसके साथ-साथ ही उन्होंने आदर्शवादिता को भी स्थापित किया । प्रसाद के कथा-साहित्य की भाषा का भी अपना भिन्न आदर्श था। उनकी कथाओं में भाव-सौंदर्य की सृष्टि प्रमुख रूप से उभरी । उनकी कथाओं में उनके व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव भी परोक्ष रूप से कहीं-कहीं मुखर होता प्रतीत होता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु यदि कहीं आवश्यकता हुई तो उन्होंने कल्पनालोक में भी विचरण किया । ‘खंडहर की लिपि’में इस तथ्य को सहज ही महसूस किया जा सकता है, जिसमें प्रेमी प्रेयसी के प्रणय-निवेदन को बार-बार ठुकरा देता है। किन्तु प्रेयसी की सच्ची प्रेम-भावना तो अमर है। वह कभी नहीं मरती । वस्तुतः यह एक पूर्व जन्म की प्रेम-कथा है, जिसमें आत्मा से मिलने हेतु आत्मा बनना पड़ता है, तभी परमात्मा में विलीन हुआ जा सकता है। इस लघुकथा में खलील जिब्रान के गद्य-काव्य का प्रभाव स्पष्ट है। उदाहरण स्वरूप ये पंक्तियाँ देखी जा सकती है-जब वसन्त में पहली लहर अपना पीला रंग सीमा के खेतों पर चढ़ा लायीं, काली कोयल ने उसे बरजना आरंभ किया और भौंरे गुनगुनाकर काना-फूसी करने लगे, उसी समय एक समाधि के पास लगे हुए गुलाब ने मुँह खोलने का उपक्रम किया; किन्तु किसी युवक के चंचल हाथ ने उसका हौसला भी तोड़ दिया। दक्षिण पवन ने उससे कुछ झटक लेना चाहा, बिचारे की पंखुड़ियाँ झड़ गयीं ।
इतना ही नहीं, जयशंकर ‘प्रसाद’अपनी बात कहने हेतु आवश्यकतानुसार बिम्ब-प्रतीकों का भी सटीक उपयोग करते हैं। अपने उद्देश्य तक पहुँचने हेतु मानव एवं मानवेतर दोनों तरह के पात्रों को अपने विशिष्ट शिल्प में प्रस्तुत करके उसे साहित्यिक ऊँचाइयों तक सहज ही पहुँचा देते हैं। उनके शिल्प को सही दिशा देने में उनकी भाषा एवं उसकी शैली की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी लघुकथा का यह अंश पढ़कर सत्यता की सहज ही परख की जा सकती है-एक कमल संध्या के प्रभाव से कुम्हला रहा था। युवक को प्रतीत हुआ कि वह धनमित्र की कन्या का मुख है। उससे मकरन्द नहीं, अश्रु गिर रहे हैं। ‘मैं निर्दोष हूँ’, यही भौंरे भी गूँजकर कह रहे हैं।इससे एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि ‘प्रसाद’कवि भी हैं, जो भावना की गहराइयों को कम-से-कम शब्दों में सम्प्रेषित कर जाते हैं ।

‘प्रसाद’भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के न मात्र हिमायती थे, बल्कि उसके सजग प्रहरी भी थे। उन्होंने भले ही अपनी विद्यालीय शिक्षा वाराणसी के क्वींस कॉलेज से मात्र वर्ग छह तक ही प्राप्त की थी, किन्तु उन्होंने अपने स्वाध्याय से जहाँ संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाएँ सीखीं, वहीं उन्होंने भारतीय आर्ष-ग्रंथों का भी जमकर अध्ययन किया । उनके अध्ययन का प्रभाव उनकी कथाओं में भी स्पष्ट देखा जा सकता है। इस संदर्भ में उनकी लघुकथाप्रसादका सहज ही अवलोकन किया जा सकता है। ‘प्रसाद’यानी ‘पारितोषिक’।
इस कथा में नायिका सरला पत्ते के दोने में पुष्प लेकर देव-प्रतिमा को अर्पित करने जाती है, किन्तु अन्य भक्तों द्वारा रत्न-खण्ड एवं स्वर्ण-मुद्राएँ अर्पित हो रही हैं और पुजारी भक्तों को फल-फूल प्रसाद स्वरूप देते आते हैं। ऐसे में नायिका अपने पूर्ण आत्म-विश्वास, किन्तु संकोच के साथ फूलों वाला दोना देव-प्रतिमा की ओर फेंक देती है, जो देवता के चरणों में गिरता है। नायिका पुनः एक कोने में खड़ी होकर अन्य भक्तों एवं पुजारी के क्रिया-कलाप को देखती रही । सब भक्तों के चले जाने के पश्चात् भी वह खड़ी रहती है। इस प्रकार अपने को अकेले खड़ी देखकर उसे आत्मग्लानि होती है कि उसकी दृष्टि देव-प्रतिमा पर पड़ती है। वह देखती कि उसके फूल भगवान के अंग पर सुशोभित हैं। वह ठिठक जाती है। पुजारी सहसा घूमकर देखता और कहता है- अरे तुम ! अभी यहीं हो, तुम्हें प्रसाद नहीं मिला, लो । जाने या अनजाने में, पुजारी ने भगवान की एकावली सरला के नत गले में डाल दी । प्रतिमा प्रसन्न होकर हँस पड़ी ।इस लघुकथा में शाश्वत प्रेम की पवित्र अभिव्यक्ति है, जिसमें समर्पण के एवज में किसी प्रसाद की आकांक्षा उचित नहीं है। प्रेम में धनवान एवं ग़रीब की दूरियाँ स्वतः मिट जाती हैं। ईश्वर समर्पण चाहते हैं। समर्पण प्रेम का ही पर्याय है। इस लघुकथा में प्रेम की उद्दीप्त मनोदशा का सटीक चित्रण है।

प्रसाद अपने साहित्य में भारतीय जीवन-दर्शन से कहीं भी अलग नहीं होते हैं और चिंतन की परम्परा में वे मानवता के उज्ज्वल भविष्य और मंगल-मूलक आदर्शों के क्रांतदर्शी-स्वप्न-द्रष्टा और अग्रदूत के रूप में खड़े दिखाई देते हैं। इस प्रकार हम यह पाते हैं कि प्रसाद की प्रत्येक लघुकथा अपने में कुछ-न-कुछ संदेश लेकर ही चलती है। कहीं उनकी लघुकथाओं में शाश्वत प्रेम है तो कहीं नारी-स्वाभिमान। ‘गुदड़ी में लाल’उनकी ऐसी ही लघुकथा है। इस लघुकथा में एक वृद्ध अपने स्वाभिमान की रक्षा में अपने प्राण तक न्योछावर कर देती है, किन्तु किसी भी कीमत पर न व टूटती है, न झुकती है। वह जब अकेले में द्वन्द्वों से उलझ-सुलझ रही होती है, तो सोचती है -जीवन भर संचित इस अभिमान-धन को मुट्ठी भर अन्न की भिक्षा पर बेच देना होगा ।... वस्तुतः प्रसाद की लघुकथाएँ उनके विचार और भावनाओं का ही सुपरिणाम है। उनकी प्रत्येक लघुकथा में हमें विचारोत्तेजक सामग्री प्राप्त होती है। नारी के प्रति उनका प्रेम एवं सम्मान प्रत्येक लघुकथा में स्पष्ट है। प्रसाद स्वयं सफल व्यवसायी थे । उन्हें अभाव नहीं देखना पड़ा, किन्तु एक संवेदनशील लेखक होने के नाते उन्हें धनहीनों के मान-सम्मान का पूरा-पूरा ध्यान रहा है। ‘गूदड़ साईं’लघुकथा को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।एक फ़कीर, जो बच्चों में ईश्वर के दर्शन करता है। उसे बच्चों से खेलने और छेड़-छाड़ करने में आनंद आता है, या यों कहिए, वह परमानंद को प्राप्त करता है। फ़कीर जिसे न मोह है, न ही माया से कोई लगाव । उसे मोहन नामक बालक से आत्मीयता हो जाती है। मोहन उसे जो कुछ भी खाने को दे-देता है, उसमें उसे अक्षय-तृप्ति होती है। मोहन के माता-पिता अपने पुत्र की फ़कीर से इस प्रकार की आत्मीयता को पसंद नहीं करते । अपने पुत्र को वह मना भी करते हैं। फकीर मनोभावों को महसूस करता है, और वह पुनः मोहन से मिलने नहीं जाता। पुनः एक लम्बे अन्तराल पर वह दिखाई देता है, तो एक लड़का उसका गूदड़ छीनकर भागता है। फ़कीर उसके पीछे भागता है। भागते-भागते उसे ठोकर लगती है और वह गिर पड़ता है। उसे चोट लगती है। सिर से खून बहने लगता है। उधर भाग रहे लड़के को मोहन के पिता पकड़ लेते हैं। फ़कीर को भी पकड़कर उठाते हैं। उस लड़के की पिटाई होने लगती है। यह देखकर फ़कीर कहता है- ‘मत मारो ! मत मारो !! चोट आती होगी।’और वह उस लड़के को छुड़ाने लगता है। इस पर मोहन के पिता पूछते हैं –‘तब चीथड़े के लिए क्यों दौड़ते थे?’ प्रत्युत्तर में वह कहता है-‘बाबा ! मेरे पास दूरी कौन वस्तु है, जिसे देकर इन ‘रामरूप’भगवान को प्रसन्न करता।’

‘तो क्या तुम इसीलिए गूदड़ रखते हो ?’

‘इस चीथड़े को लेकर भागते हैं भगवान और मैं इनसे लड़कर छीन लेता हूँ । रखता हूँ फिर उन्हीं से छिनवाने के लिए, उनके विनोद के लिए । सोने का खिलौना तो उचक्के भी छीनते हैं, पर चीथड़ों पर भगवान ही दया करते हैं।’

लघुकथा अपने चरम-बिन्दु पर आकर न मात्र झकझोरती है, अपितु सोचने पर भी विवश करती है। इस लघुकथा में ‘प्रसाद’ने बहुत ही चतुराई से दो वर्ग के चरित्रों को सामने रखते हुए सामंती चरित्र के लोगों पर जबरदस्त प्रहार भी किया है।
आज दलित-साहित्य की चर्चा ज़ोरों पर है। परन्तु ‘प्रसाद’तो आज से कई दशकों पूर्व दलितों पर लिख चुके हैं। दलित पात्र के चरित्र को ऊँचाई तो प्रदान की ही, उसे सम्मान भी दिया है। सबकुछ सहज एवं स्वाभाविक, कहीं कुछ भी आरोपित नहीं । सबकुछ विश्वसनीय । शीर्षक भी सटीक है। अपने उन्हीं गुणों के कारण यह एक कालजयी लघुकथा बन गई है।

‘प्रसाद’ने संख्या की दृष्टि से बहुत कम यानी कुल जमा नौ लघुकथाएँ ही लिखीं । उनमें अधिकतर लघुकथा-जगत् का गौरव सिद्ध हुई हैं । प्रसाद ने अपनी इन नौ लघुकथाओं में जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श किया है। उन्होंने पति-पत्नी के संबंधों को भी लघुकथाओं का विषय बनाया है। उसका निर्वाह भी पूरी गरिमा के साथ किया है। ‘कलावती की शिक्षा’इस संदर्भ में एक श्रेष्ठ उदाहरण स्वरूप देखी-परखी जा सकती है।नायक श्याम सुन्दर अपनी पत्नी कलावती को मूर्ख-गँवार समझता है। उसे इस सीमा तक हीन समझता है कि पानी के प्रणय-निवेदन को बहुत रुखाई के साथ ठुकरा देता है। वह पुस्तक पढ़ने में मस्त हो जाता है। कलावती बहुत समझदार एवं पढ़ी-लिखी सिद्ध होती है। वह पुतली को माध्यम बनाकर अपने पति पर व्यंग्य कसती है –‘लज्जा कभी न करना, यह पुरुषों की चालाकी है, जो उन्होंने इसे स्त्रियों के हिस्से कर दिया है। यह दूसरे शब्दों में एक प्रकार का भ्रम है, इसलिए तुम भी ऐसा रूप धारण करना कि पुरुष,जो बाहर से अनुकम्पा करते हुए तुमसे भीतर-भीतर घृणा करते हैं, वह भी तुम से भयभीत रहें,तुम्हारे पास आने का साहस न करें । कृतज्ञ होना दासत्व है। चतुरों ने अपना कार्य-साधन करने का अस्त्र इसे बनाया है; इसीलिए इसकी ऐसी प्रशंसा की है कि लोग उसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। किन्तु है यह दासत्व । यह शरीर का नहीं, किन्तु अन्तरात्मा का दासत्व है। ..... सोने के कोर की साड़ी तुम्हारे मस्तक को अभी भी ढके है, इसे तनिक खिसका दो । बालों को लहरा दो । लोग लगें पैर चूमने, प्यारी पुतली ! समझी न ?’
इसके पश्चात् नायक-नायिका के कटाक्ष को समझ लेता है, और नायिका पति के गले लग जाती है। इसमें बात सिर्फ पति-पत्नी के संबंधों तक ही सीमित नहीं है। इसमें मूल बात यह है कि लोग तथाकथित आधुनिकता की ओर बेतहाशा भागे जा रहे हैं। बाह्य सौंदर्य की मरीचिका के भ्रम-जाल में फँसते जा रहे हैं। परिणामतः कलावती जैसी नायिका के आन्तरिक सौंदर्य को वे न तो देख पाते हैं - न समझ पाते हैं। सच्चाई से दूर, पवित्रता से पलायन करते हुए गंदगी में फँसने में ही अपनी भलाई समझते हैं। ऐसे भटके हुए लोगों को रचना एक सही रास्ते की ओर दिशा-निर्देश करती है। आन्तरिक सौंदर्य ही मनुष्य-जीवन को आनंद की चरम-सीमा के दर्शन करा पाने सक्षम हो पाता है। यह लघुकथा जहाँ भावपूर्ण है, वहीं वैचारिक धरातल पर भी बहुत मजबूती से खड़ी है। ‘प्रेम’- जिसे आज के तथाकथित साहित्यिक लोग साहित्य में ‘आउटडेट्ड’मानते हैं। उन्होंने जहाँ इसे भावना के स्तर पर रखा है-वहीं आवश्यकता पड़ने पर वैचारिक रूप भी प्रस्तुत किया है, तो कभी यथार्थ के धरातल पर भी खड़ा किया है। ‘प्रेम’छायावाद के मूल में था या यों कहिए वह छायावाद की आत्मा था ; किन्तु वह प्रेम कभी सतही स्तर पर नहीं आया। छायावाद में प्रेम अनेक-अनेक रूपों में प्रस्तुत हुआ है। वह प्रत्यक्षतः किसी रूप में दिखाई देता है, तो परोक्षतः वह कहीं और ले जाता है। अब यह पाठक के स्तर पर निर्भर है कि वह उसे किस स्तर पर समझता या महसूस करता है। बिना छायावाद को समझे ‘प्रसाद’जी की लघुकथाओं के सही उद्देश्य तक पहुँचना भी काफी कठिन है। इस श्रेणी में ‘चक्रवर्ती का स्तम्भ’, ‘उस पार का योगी’, ‘पत्थर की पुकार’, और ‘करुणा की विजय’लघुकथाएँ सहज ही आ जाती हैं। इन सबके मूल में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष ‘प्रेम’ही है।

‘चक्रवर्ती का स्तम्भ’में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ जिस पर शील और धर्म की आज्ञा खुदी है; किन्तु सामंती अपनी सुख-सुविधा एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु बातों को कहाँ मानते हैं। भोग-विलास जिनका इष्ट हो-वे दमनकारी हो ही जाते हैं। परिणाम विध्वंस ही होता है। अत्याचार -ही-अत्याचार होता है। किन्तु धर्मरक्षित, जिसे अपने शील एवं धर्म से प्रेम है वह कहता है-‘मुझे चाहे बाँध लो, किन्तु इन सभी को छोड़ दो। वह भी सम्राट था, जिसने इस स्तम्भ पर समस्त जीवों के प्रति दया करने की आज्ञा खुदवा दी थी। क्या तुम देश विजय करके सम्राट हुआ चाहते हो? तब दया क्यों नहीं करते ?’ तात्पर्य यह है कि जिसके हृदय में दया नहीं, वह राजा नहीं, यानी राजा के योग्य नहीं है। ‘प्रसाद’गाँधी-युग के लेखक हैं-अतः युगीनता उनके लेखन में भी आ गई हो तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए । प्रेम, सत्य और अहिंसा का संदेश देती यह लघुकथा बिम्ब एवं प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। इसका अन्तिम वाक्य प्रत्यक्ष तो नहीं, परोक्ष रूप से लघुकथा के संदेश को सम्प्रेषित करने में सक्षम हो जाता है - ‘चक्रवर्ती का स्तम्भ’अपने सामने यह दृश्य न देख सका । अशनिपात से खण्ड-खण्ड होकर गिर पड़ा । कोई किसी का बन्दी नहीं रहा।’

हिन्दी-लघुकथाओं पर खलील जिब्रान का प्रभाव स्पष्ट है। खलील जिब्रान ने जिस सुन्दरतम ढंग से मानवेतर पात्रों का सदुपयोग करके अपने उद्देश्य की प्राप्ति की है-वह दुर्लभ ही है। प्रसाद ने भी इस दिशा में प्रयोग किया है। ‘दरिद्रता’और ‘करुणा’की विजय’का सृजन किया है। इस लघुकथा में व्यवस्था पर चोट की गई है। कोई भूख से मरे, या किसी का पेट न भरे, तो यह दोष व्यवस्था का है, न कि जनता का। इस लघुकथा का सार इन कतिपय पंक्तियों में है-प्रसन्न-वदन न्यायाधीश ने एक स्थिर दृष्टि से देखते हुए अपराधी मोहन से कहा, ‘बालक ! तुमने अपराध स्वीकार करते हुए कि रामकली अपनी बहिन की हत्या तुम्हीं ने की है, मृत्युदण्ड चाहा है। किन्तु न्याय अपराध का कारण ढूँढ़ता है। सिर काटती तलवार है, किन्तु वही सिर काटने के अपराध में नहीं तोड़ी जाती है। निर्बोध बालक! तुम्हारा कुछ भी अभी कर्तृत्व नहीं है। तुमने यदि हत्या की भी हो, तो तुम केवल हत्या के अस्त्र थे। नगर के व्यवस्थापक पर इसका दायित्व है कि तीन वर्ष की रामकली तुम्हारे हाथों में क्यों दी गई?’ अतः दरिद्रता हार गई और करुणा की विजय हुई। वर्तमान में ऐसी रचनाएँ कम ही देखने को मिलती हैं। ऐसी रचनाएँ लिखना खेल नहीं है। आदमी पत्थर को पूजता है-पूज सकता है, किन्तु किसी ग़रीब का दुःख-दर्द सुनने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है। उसके लिए कोई कुछ नहीं करता । कोरी कल्पना से सपने सँजोये जा सकते हैं। अपने को भ्रम में रखकर क्षणिक आनंद प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु जीवन तो यथार्थ पर ही चलता है। ‘पत्थर की पुकार’लघुकथा में यही बात है। यह एक ग़रीब संगतराश को केन्द्र में रखकर लिखी गई रचना है, जो वार्त्तालाप के क्रम में विमल (एक पात्र) से कहता है- ‘आप लोग अमीर आदमी हैं। अपनी कोमल श्रवणेन्द्रियों से पत्थर का रोना, लहरों का संगीत, पवन की हँसी इत्यादि कितनी सूक्ष्म बातें सुन लेते हैं, और इसी प्रकार दत्तचित्त हो जाते हैं। करुणा से पुलकित होते हैं, किन्तु क्या कभी दुखी हृदय के नीरव क्रन्दन को भी अन्तरात्मा की श्रवणेन्द्रियों को सुनने देते हैं, जो करुणा का काल्पनिक नहीं, किन्तु वास्तविक रूप है?’ यह लघुकथा सामंती प्रवृत्ति एवं नेता-चरित्र लोगों पर प्रहार करती है, जो वास्तविकता को दरकिनार करके झूठी वाह-वाही लूटने के लिए सच्चाई पर पर्दा डालने का असपफल प्रयास करते हैं ।
‘प्रेम’नाम है समर्पण का - त्याग का । इसमें स्वार्थ एवं वासना के लिए कोई स्थान नहीं है। जहाँ स्वार्थ एवं वासना है - वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता । प्रेम ही परमानंद तक ले जाता है। यही कथ्य है ‘उस पर का योगी’का । नन्दलाल एवं नलिनी के पवित्र प्रेम की कथा किरण एवं लहरी-दो मानवेतर पात्रों द्वारा अभिव्यक्त हो पाती है। इन्हीं दोनों के संवादों से ही सम्प्रेषित हो पाती है यह लघुकथा । इस लघुकथा में प्रसाद का विशुद्ध छायावाद हावी है, जिसे समझने हेतु ‘प्रसाद’के व्यक्तित्व को पूरी अंतरंगता से देखना अनिवार्य है।

कथा-साहित्य में भाषा की दो प्रवृत्तियाँ समानान्तर चलती हैं। चरित्र-चित्रण में जहाँ लेखन वर्णनात्मक प्रसंग लाता है, वहाँ लेखक अपने व्यक्तित्व एवं अपनी भाषा के साथ विद्यमान होता है, किन्तु जहाँ पात्र संवाद बोलता है-वहाँ लेखक की भाषा नहीं, अपितु पात्र एवं उसके चरित्र तथा परिवेश की भाषा होनी चाहिए, किन्तु प्रसाद प्रत्येक कथा में भाषा की एक ही प्रवृत्ति को लेकर चलते हैं, जिसमें कहीं-कहीं पात्र की विश्वसनीयता पर सहज ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। किन्तु चूँकि ‘प्रसाद’मूलतः कवि हैं, अतः इनकी कविताओं में कवित्व का प्रभाव भाषा के स्तर पर भी स्पष्ट परिलक्षित होता है। यही कारण है प्रसाद की लघुकथाएँ आम पाठकों के लिए कम, प्रबुद्ध पाठकों के लिए अध्कि हैं। इस दुरूहता का एक कारण उनका छायावादी होना तो है ही, दूसरा कारण आर्ष-ग्रन्थों का अध्यात्म एवं उनका दार्शनिक पुट भी है। ‘प्रसाद’की लघुकथाएँ कहीं-कहीं अधिक वर्णनात्मक हो जाने के कारण लघुकथा के स्वाभाविक आकार का अतिक्रमण कर जाती हैं। यों ‘प्रसाद’ने इन लघुकथाओं को संभवतः ‘लघुकथा’के तौर पर लिखा भी नहीं था। कारण ‘प्रसाद’के समय में कहानी, उपन्यास एवं लघुकथा के ऐसे कोई मानदंड भी नहीं बने थे-या बनाए नहीं गए थे। यह वह काल था जब हिन्दी-कथा-साहित्य अपनी शिशु अवस्था में खेल रहा था। अतः ‘प्रसाद’की लघुकथाओं को आज की लघुकथों के निकष पर कसना उनके साथ अन्याय करने जैसा होगा । हाँ ! उनकी लघुकथाओं में हम परम्परा की तलाश कर सकते हैं। उनकी लघुकथाएँ चूँकि आज की लघुकथा के पूर्ण रूपेण तो नहीं, किन्तु काफी हद तक समीप हैं। अतः उनमें लघुकथा के बीज-तत्त्वों की खोज सहज ही की जा सकती है ।

सम्पर्क-डॉसतीशराज पुष्करणा, बिहार सेवक प्रेस‘लघुकथानगर’,
महेन्द्रू, पटना-800 006 (बिहार)
मो- 08298443663,

 

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