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1-पर्दे पर दिखेंगी ‘ठंडी रजाई’ एवं अन्य लघुकथाएँ
सुकेश साहनी की चर्चित लघुकथा ‘ठंडी रजाई’ अब पर्दे पर देखी जा सकेगी। इस कथा पर लघु फिल्म(शार्ट फिल्म) का निर्माण बिग ऐम इंटरटेनमेंट बैनर के तले किया जा रहा है। इस फिल्म की शूटिंग दिनाक 17.03.2013 को चिल्ड्रन एकेडमी स्कूल,बरेली में प्रारम्भ हुई। शूटिंग का उदघाटन प्रसिद्व छायाकार दीपक घोष द्वारा किया गया।
फिल्म के निर्देशक नदीम अजवर के अनुसार फिल्म में बरेली मण्डल के प्रतिभाशाली कलाकारों को अवसर प्रदान किया गया है। दर्शक लघु फिल्म को लघुकथा डॅाट काम,यू टयूब सहित अन्य दृश्य माध्यमों से देख पाएँगे। नदीम अजवर ने बताया प्रथम चरण में सुकेश साहनी की चार अन्य लघुकथाओं–यम के वंशज,अंतत:,दादा जी एवं स्कूल का चयन किया गया है।
ठंडी रजाई के तीन मुख्य पात्र पति,पत्नी और पड़ोसन के किरदार नकीबुदीन,झरना मिश्रा और गरिमा हैं। अन्य पात्रों में संजय,अतीक अहमद सिद्दीक और ध्रुव हैं।
-प्रस्तुति: पप्पू वर्मा
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मिन्नी कहानी (लघुकथा) पर लुधियाना में सेमिनार
17 मार्च को लुधियाना में मिन्नी कहानी पर पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना द्वारा सेमिनार का आयोजन किया गया। इममें डा. अनूप सिंह, डा. नायब सिंह मंडेर और डा. श्याम सुंदर ‘दीप्ति ने आलेख पढ़े, जबकि अध्यक्ष मंडल में डा. अशोक भाटिया, प्रो. निरंजन तस्नीम, मित्तर सेन मीत और गुरपाल लिट्ट मौजूद थे।
अकादमी के सचिव और सेमिनार के संयोजक-संचालक सुरिंदर कैले ने कहा कि यह सेमिनार लघुकथा के एक पड़ाव का काम करेगा। डा. अनूप सिंह ने ‘मिन्नी कहानी में राजनीतिक व सामाजिक चेतना’ विषय पर बोलते हुए कहा कि पूँजीवाद की चरमसीमा के दौर में मिन्नी कहानी का उभार हुआ है। उन्होंने कहा कि मिन्नी कहानी में सामाजिक सरोकार व प्रतिनिधि यथार्थ होना चाहिए। डा. नायब सिंह मंडेर ने ‘मिन्नी कहानी में नारी की दशा व दिशा ’ आलेख पढ़ते हुए नारी की वर्तमान सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी युग के प्रांरभ होने से स्त्री की चेतना बढ़ी है और उसमें बराबरी की संभावनाओं ने जन्म लिया है। फिर अनेक मिन्नी कहानियों का उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि मिन्नी कहानी में नारी-चेतना को संघर्ष में तब्दील करने की कोशिश की गई है। डा. श्यामसुंदर दीप्ति ने ‘मिन्नी कहानी में बुजुर्गों का जन-जीवन’ विषय पर बोलते हुए कहा कि एक तरफ़ अकेलापन है, तो दूसरी तरफ़ माँ-बाप बच्चों को ‘सेट’ करने की लालसा में देश के कोने-कोने ही नहीं, विदेश में भी उन्हें खुद ही भेजते हैं। उन्होंने कहा कि विषय से पहले लेखकों को मिन्नी कहानी का रूप स्पष्ट होना जरूरी है। थोड़े शब्दों में अधिक करने के लिए बड़े अभ्यास की जरूरत होती है। कई लेखक मिन्नी कहानी को साहित्य में प्रवेश-द्वार की तरह लेते हैं।
चर्चा में भाग लेते हुए हरप्रीत सिंह राणा ने कहा कि कमजोर कहानियों के बीच मॉडल मिन्नी कहानियाँ दब गई है। उन्होंने मिन्नी कहानी के काव्य शास्त्रीय पक्ष पर भी लिखे जाने पर बल दिया। हरभजन खेमकरनी ने नए मिन्नी कहानीकारों द्वारा श्रेष्ठ साहित्य न पढ़ने और छपने को बहुत महत्त्व देने पर चिंता जाहिर की। सूफी अमरजीत ने कहा कि हरेक लेखक का विधान-संबंधी अपना ही मापदंड होता है। मिन्नी कहानी को अन्य विधाओं की भाँति महत्त्वपूर्ण नहीं समझा जाता, जबकि मिन्नी कहानी भी जीवन से जुड़ी है।
अध्यक्ष मंडल से मित्तर सेन मीत ने कहा कि मिन्नी कहानी की भांति मिन्नी उपन्यास का भी विधा-विधान बनाया जाना चाहिए। प्रो. निरंजन तस्नीम ने कहा कि संक्षिप्तता ही मिन्नी कहानी का प्रमुख गुण है। उन्होंने मंटो की ‘स्याह हाशिए’ से कुछ लघुकथाएँ प्रस्तुत कर मिन्नी कहानी की शक्ति को रेखांकित किया। गुरपाल लिट्ट ने कहा कि ‘अणु’ ने सबसे पहले मिन्नी कहानी को प्रकाशित किया है। इसका दूसरा अंक सन् 1972 में ‘मिन्नी कहानी विशेषांक (विद्रोही रंग) था। 1970 के दशक में बंगाल में बांग्ला मिन्नी कहानियों की कई पत्रिकाएँ आती थीं।
अंत में डा. अशोक भाटिया ने कहा कि पंजाबी अकादमी द्वारा मिन्नी कहानी पर लगातार तीसरे वर्ष सेमिनार का आयोजन और पढ़े गए तीन आलेख पंजाबी साहित्य में मिन्नी कहानी की मजबूत दस्तक के प्रमाण हैं। किंतु मिन्नी कहानी (लघुकथा) को शब्दों, वाक्यों या पंक्तियों जैसे बाहरी आधारों से मापना गलत है। ऐसा किसी भी विधा में नहीं होता। एक तो छोटे कैनवास के कारण मिन्नी कहानी बहुत विस्तार नहीं ले पाती, फिर उस पर रचना-विरोधी शर्तें थोपना उसके पनपने में बाधाएँ खड़ी करने जैसा है। यह लघुकथा के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उदय प्रकाश की कहानियों ‘पीली छतरी वाली लड़की’ आदि के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कहानी तीन-चार पृष्ठ से करीब डेढ़ सौ पृष्ठ तक जाती है, तो मिन्नी कहानी (लघुकथा) के लिए ही क्या मुसीबत है कि वह एक पृष्ठ के घूँघट से बाहर झाँक भी नहीं सकती। ऐसी बाहरी शर्तें रचना और पात्रों पर दबाव बनाती हैं और उसके सहज सौंदर्य को नष्ट करती हैं। वास्तव में रचनाएँ ही रचना-विधान बनाती और सँवारती हैं। अच्छी रचना वह है जिसे पढ़कर पाठक का कद बढ़ जाए।
इस अवसर पर त्रिलोचन लोची, धर्मपाल साहिल, रणजीत आजाद कांझला, गुरचरण कौर कोचर, मलकीत सिंह बिलिंग, जोगिंदर भाटिया, गुरमीत सिंह बिरदी, जसबीर सिंह सोहल, इंजी. डी.एम सिंह, प्रो. उत्तमदीप कौर, दलबीर लुधियानवी, वसीम मलेरकोटला, लील दयालपुरी, करमजीत ग्रेवाल आदि बड़ी संख्या में लेखक-श्रोता उपस्थित थे।
(समाचार सौजन्य : डॉ अशोक भाटिया, करनाल)
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