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‘उन्नीसवाँ अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन, 2010’ सम्पन्न
राजस्थान साहित्य एकादमी : लघुक
 
   
     
 
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सुकेश साहनी
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रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
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चर्चा में
 
 
राजस्थान साहित्य एकादमी एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा राजस्थान में पहली बार लघुकथा समारोह आयोजित किया गया। समारोह में मुख्य अतिथि श्रीमती ‘डॉ.सुलोचना रांगेय राघव’ अध्यक्षता राजस्थान साहित्य अकादमी की अध्यक्ष डॉ. श्रीमती अजीत गुप्ता ने की। इसका संयोजन प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बद्री प्रसाद पंचोली ने किया।
उद्घाटन सत्र में श्रीमती सुलोचना जी ने लघुकथा विधा पर समुचित ध्यान दिए जाने की आवश्यकता बताई और कहा कि लघुकथा पर ऐसे आयोजन हर प्रांत और शहर में होने चाहिए। उन्होंने स्वर्गीय रागेय राघव सी जुड़ी स्मृतियाँ ताजा की। प्रबुद्ध प्राध्यापिका एवं लेखिका के रूप में अपने अनुभवों को श्रोताओं से साझा किया।
सारस्वत अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध कथा लेखक श्री भगवान अटलानी ने कहा, आज लोगों के पास समय का अभाव है फिर भी कथ्यशिल्प और बनावट में कसी हुई लघुकथा पाठक को झकझोरती हैं और उसे सोचने पर विवश करती है।
विशिष्ट अतिथि एवं सास्कृतिक संस्थान के अध्यक्ष श्री ओंकार सिंह लखावत जी ने अपने उदबोधन में लघुकथा आंदोलन को नई दिशा देने की आवश्यकता बताई। आयोजन में अनेक विद्वानों ने मत व्यक्त किया कि लघुकथा का इतिहास मनुष्य के पढ़ने और लिखने जितना ही पुराना है।
राजस्थान में लघुकथा : दिशा और दशा पर बोलते हुए डॉ. संदीप अवस्थी ने बताया कि राज्य में मौर्य कर्णसवा (कोटा) बारदौली शिलालेख प्राचीन भारत के काल के हैं, उनपर उस समय की कई महत्वपूर्ण कथाएं अंकित हैं। ठाकुर केसरी सिंह बारहठ के सोरठे ‘‘चेतावनी रा. चूगतयाँ’’ जिन्हें 19 शताब्दी में लिखा गया, उसे पढ़कर मेवाड़ का महाराणा अंग्रेजों के दिल्ली दरबार में नहीं गया। डॉ. अवस्थी ने खलील जिब्रान, चेखव, मो. आन की लघुकथाओं का जिक्र किया।
अध्यक्षीय उदबोधन ने डॉ.श्रीमती अजीत गुप्ता ने पंचतंत्र, जातक कथाओं, बोधकथाओं का उल्लेख करते हुए वर्तमान में लिखी जा रही लघुकथाओं को महत्वपूर्ण बताया लेकिन उन्होंने इसे साहित्य की मुख्य धारा में पूरी तरह स्थान न दिए जाने पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राजस्थान के भगवान अटलानी, डॉ. रामकुमार घोटड़ डॉ. मुद्गल, जैबा रशीद, डॉ. संदीप अवस्थी, राम जैसवाल आदि अनेक साहित्यकार अच्छी लघुकथाएं लिख रहे है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आज हम संवेदना शून्य हो रहे है, संवेदनाओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य लघुकथा ही कर सकती है।
लघुकथा आंदोलन में गत 27 वर्षों से अनवरत अपनी आहुति दे रहे श्री सुकेश साहनी का फैक्स पर भेजा गया संदेश डॉ. संदीप अवस्थी ने पढ़कर सुनाया तो सुदूर राजस्थान में बैठे कई साहित्यकारों ने भाई सुकेश को आत्मीयता से स्मरण किया। याद दिलाया गया कि भाई सुकेश साहनी लघुकथा के क्षेत्र में अपने निरंतर प्रयासों से लघुकथा का झंडा बुलंद किए हुए हैं और अपनी मजबूत पहचान स्थापित की है।
संयोजक एंव अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. बद्रीप्रसाद पंचोली के अथक प्रयासों के कारण ही यह समारोह काफी ज्ञानवर्धक रहा और अजमेर ही नहीं वरन् राजस्थान के सभी महत्वपूर्ण शहरों, गाँव–कस्बों से पधारे साहित्यकारों, श्रोताओं एवं महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय,अजमेर के शोधार्थियों की लघुकथा विषयक जानकारी में इजाफा करने वाला एक ऐसा सफल आयोजन रहा, जिसकी प्रशंसा करने से विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे कुलपति मोहनलाल जी दीपा भी खुद को नहीं रोक पाए।
समारोह के समापन में वरिष्ट साहित्यकारों रघुराज सिंह हाड़ा, विजयदान देथा तथा युवा रचनाकार शिविर के प्रतिभागियों का सम्मान किया गया । इस अवसर पर राजस्थानी, पंजाबी, मलयालम, हिंदी, संस्कृत, सिंधी भाषाओं की लघुकथाओं का पाठ भी साहित्यकारों ने किया। इस आयोजन पर अकादमी शीघ्र ही एक लघुकथा संग्रह प्रकाशित करने जा रही है।
प्रस्तुति –डॉ. संदीप अवस्थी
66/26, न्यू कालोनी, रामगंज, अजमेर।
July, 2007
हरियाणा साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका ‘हरिगन्धा का जुलाई अंक लघुकथा पर केन्द्रित था। इस अंक में 37 लेखकों की 74 लघुकथाएँ प्रकाशित कि गई हैं ।डा0 अशोक भाटिया एवं भगीरथ के दो लेख ,जर्मन लेखक फ़्रांत्स होलर से श्री अमृत मेहता के माध्यम से डा भाटिया की लघुकथा पर लघु बातचीत, ‘लघुकथा की सीमा और सम्भावनाएँ’ पर सर्वश्री सतीश राज पुष्करणा ,सूर्यकान्त नागर ,सुरेश यादव और युगल की परिचर्चा इस अंक के मुख्य आकर्षण हैं । ।संभवत:पृष्ठों की सीमा के कारण बहुत से चर्चित लघुकथाकारों का समावेश नहीं हो सका है । आगामी अंकों में समावेश हो सकेगा तो अच्छा होगा । अकादमी का यह प्रयास लघुकथा-जगत में सराहनीय है । सम्पादक-मण्डल इस कार्य के लिए बधाई के पात्र हैं।
अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथामंच की ओर से रविवार दिनांक 15.07.07 को बिहार हिन्दी साहित्य–सम्मेलन,कदमकुआ में सुकेश साहनी की लघुकथाओं का पाठ और उनकी रचनाओं पर विमर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन सम्मेलन के प्रधानमंत्री रामनरेश सिंह ने किया। इस मौके पर डॉ0 सतीशराज पुष्करणा द्वारा सुकेश साहनी की छह लघुकथाओं– घंटिया, मृत्युबोध, कस्तूरीमृग, तोता, विजेता, आइसबर्ग का पाठ किया गया। इन रचनाओं पर श्रीमती पुष्पा जमुवार,डॉ0मिथिलेश कुमारी मिश्र,हारुन रशीद एवं डॉ0 सतीशराज पुष्करणा ने आलेख पाठ किए। डॉ0 मिश्र ने साहनी की लघुकथाओं को शिल्प की दृष्टि से सराहनीय बताया। हारुन रशीद ने युग समय और मनोस्थिति के अनुकूल बताते हुए कहा कि यह रचनाएँ मानवीय भावनाओं को व्यक्त करती हैं। डॉ0 पुष्करणा ने कहा कि सुकेश का व्यंग्य उनके भावों में व्यक्त होता है, वह लेंजर की तरह इतना महीन एवं धारदार होता है कि बहुत सचेत एवं गंभीर पाठक ही उसे पकड़ पाते हैं। सुकेश की रचनाएँ धर्मान्धता में डूबे लोगों पर प्रहार करती हैं । रचनाओं पर टिप्पणी करते हुए सुप्रसिद्ध समालोचक नचिकेता ने कहा कि यह लघुकथाएँ शिल्प के स्तर पर शेफ है किन्तु भाषा के स्तर पर इनमें असावधानी दिखती है । डॉ0 नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए म्हत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर श्रीकांत व्यास,सिद्धेश्वर,हदयनारायण,मंजू कुमारी,बी.एन.विश्वकर्मा आदि ने भी अपने विचार रखे। संचालन डॉ0 सतीशराज पुष्करणा ने किया। अध्यक्षता श्री कृष्णानन्द ‘कृष्ण’ ने की ।

 
June, 2007

सर्वश्री श्याम सुन्दर दीप्ती,श्याम सुन्दर अग्रवाल और विक्रमजीत सिंह ‘नूर’ के सम्पादन में पंजाबी भाषा में ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ का प्रकाशन हुआ।वैसे तो पिछले दो दशकों से ‘मिन्नी’ पंजाबी त्रैमासिक के माध्यम से विश्व स्तर की लघुकथाएँ निरन्तर छपती रही हैं । विभिन्न विषयों पर केन्द्रित इस पत्रिका के विशेषांक भी सराहे गए हैं।
‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ संग्रह में विश्व की विभिन्न भाषाओं की लघुकथाएँ संगृहीत हैं ।इनमें प्रथम खण्ड में प्रमुख हैं –अरबी ,अंगरेज़ी ,आइरिश ,स्पेनी ,चीनी ,जर्मन ,नेपाली ।पोलिश , फ़्रेंच ,युगोस्लाव ,रूसी एवं हगेरियन लघुकथा ।दूसरे खण्ड में असमिया ,कन्नड़ ,उड़िया तमिल ,तेलुगु बांग्ला ,मराठी ,मलयालम ,मणिपुरी आदि भारतीय भाषाओं की चुनी हुई लघुकथाएँ हैं ।तीसरे खण्ड में हिन्दी एवं चौथे खण्ड में पंजाबी के चर्चित लघुकथाकारों की रचनाएँ दी गई हैं ।
पाँचवाँ खण्ड आलोचना का है ।इस खण्ड में लघुकथा के शिल्प एवं सरोकारों पर गम्भीर चर्चा हुई है । डॉ कुलदीप सिंह ‘दीप’,श्री निरंजन बोहा , डॉ अनूप सिंह , डॉ सतीश दुबे ,श्री भगीरथ ,एवं श्री बलराम के विचारोत्तेजक लेखों से पुस्तक की उपादेयता बढ़ गई है ।
भारतीय भाषाओं की लघुकथाएँ विश्वकथा में अपनी मुख्य भूमिका निभाएँगी;यह संग्रह ऐसा विश्वास दिलाने में सक्षम है ।प्रेरणा प्रकाशन अमृतसर से प्रकाशित 252 पृष्ठों की यह पुस्तक अपनी सक्षम लघुकथाओं के द्वारा अपनी छाप छोड़ सकेगा ,ऐसा विश्वास है ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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