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लघुकथाएँ - संचयन - ऋता शेखर ‘मधु’
युग परिवर्तन
‘माँ, आप क्या लिख रही हैं.’’
‘बेटे,मेरे मन में कुछ विचार हैं,जिन्हें मैं
कलमबद्ध करना चाहती हूँ.’’
‘तो कागज पर क्यों लिख रही हो.’’
‘फिर कहाँ लिखूँ.’’
‘लैपटाप पर लिखो.’
‘मुझे तो नहीं आती.हमारे जमाने मैं कम्प्यूटर नहीं था न,
हमने तो कागज पर लिख कर ही पढ़ई की है.’
‘अब सीख लो.’
‘मुझसे नहीं हो पाएगा.’
‘ऐसा नहीं है. मैं आपको सिखाऊँगा.’
बेटे ने माँ की उँगली पकड़ की-बोर्ड पर दौड़ानी शुरू की| स्क्रीन पर अक्षर के मोती उभरने लगे. माँ की आँखैं बरबस ही गीली हो गईं.
उसे बसंत पंचमी का वह दिन याद आ गया जब उसने बेटे के हाथों में स्लेट पकड़ाया था और उसकी उँगली पकड़कर प्रथम अक्षर लिखवाया था.
उस दिन मदर्स डे था और इससे अच्छा कोई उपहार हो ही नहीं सकता था.
अब हाथों में लेखनी की जगह की-बोर्ड और कागज़ की जगह स्क्रीन है. न स्याहियाँ ख़त्म होती हैं और न कागज़ फ़टते हैं. अच्छी हैंन्डराइटिंग के लिए कान भी नहीं मरोड़े जाते हैं.
यह युग परिवर्तन ही तो है|
 
 
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